मैसूर मे श्री सुमति नाथ जैन श्वेतांबर मूर्ति पूजक संघ के तत्वावधान में आज महावीर भवन परिसर मे साध्वी कुसुमप्रभा श्रीजी ने प्रवचन देते हुए कहा कि "एकेकु डगलु शत्रुंजय समो जेह ऋषभ कहे भव
क्रोड ना कर्म खपावे तेह " आज फाल्गुन सुदी तेरस का दिन यानी फागण की फेरी का दिन जिस दिन शांब ओर प्रदुम्न साढे आठ करोड़ मुनियों के साथ मोक्ष में पधारे l आज के दिन शाश्वत तीर्थराज के ऊपर हजारों लाखों श्रद्धालु भक्तगण फ़ागण की फेरी करने जाते हैं l अन्य तीर्थों की यात्रा से जो फल मिलता है उससे अनंत गुणा फल की प्राप्ति गिरिराज के दर्शन से होती है l शत्रुंजयगिरि के दर्शन सिर्फ भव्य आत्मा ही कर सकती है l पापी अभव्य नजरे ना देखे l जीवन में बार भी पालीताणा तीर्थ की यात्रा हुई यानि हमारा मोक्ष निश्चित लेकिन यात्रा के दौरान तीर्थ की आशातना नहीं होनी चाहिए l क्योंकि अन्य स्थाने कृत पाप,तीर्थ स्थाने विनश्यति, तीर्थ स्थाने कृत पाप.बज्रलेपो भविष्यति "विमलगिरी की यात्रा करके हमारी आत्मा भी विमल निर्मल कसायो से मुक्त बन जाती है l तभी हमारी यात्रा फ़लीभुत होती है l इस पर काका भतीजे का सुंदर द्रतान्त दिया गया है l साथ ही शत्रुंजय के 16 उधारो का भी सुन्दर वर्णन बताया l नुतन जिनालय निर्माण व जिर्णोद्वार करवाने से 8 गुणा फ़ल मिलता है l आसो सुद पूनम के दिन पांडवमुनि 20 करोड़ के साथ कार्तिक सुद पुनम डाविड वारिखिल्ल 10 करोड़ मुनियों के साथ चैत्री पूनम के दिन पुंडरीक स्वाम 5 करोड़ मुनियों के साथ और भी कई आत्माए सिद्ध गिरिराज से सिद्धि गति को प्राप्त हुए l जहां का कण कण पवित्र है l गिरीराज के 108 नाम भी अलग अलग प्रसंगो को लेकर पड़े हैं l शत्रुंजय नाम कैसे पड़ा ? शुकराजा का राज्य चन्द्रशेखर राजा ने हड़प लिया वो भी शुकराजा का रुप धारण कर l लोगो को व असली राजा लगने लगा l लेकिन असली शुकराजा आया तब लोगों ने उसे नकली समझ कर भगा दिया गया l मुनिराज का उपदेश पा कर शुकराजा ने गिरीराज की गुफ़ा में 30 दिन तक गिरीराज का ध्यान किया l जिस तीर्थ का सिर्फ़ ध्यान धरने से बिना युध्द किये ही शुकराजा ने शत्रु पर जय प्राप्त कर ली गयी l ध्यान के प्रभाव से नकली शुकराजा बने हुए चंद्रशेखर राजा की बहुरुपी विधा पलायन हो गई l जो मंत्रीयो को शुकराजा दिख रहा था वो पुनः चंद्रशेखर दिखने लगा l शत्रु पर जय प्राप्त करने पर शुकराजा ने गिरीराज का नाम शत्रुंजय रखा l प्रवचन के बाद फ़ागण की फ़ेरी की भाव यात्रा का वर्णन कान्ति लाल जैन के निवास स्थान पर किया गया l शत्रुंजय के सामने चैत्यवंदन ओर भांडवा डुगर की यात्रा कर के सिद्धवड की यात्रा के साथ ही फ़ागण की फ़ेरी की यात्रा सम्पूर्ण की गई l सकल संघ मे अपुर्व उत्साह व उमंग था l इस अवसर पर श्री सुमति नाथ जैन श्वेतांबर मूर्ति पूजक संघ के अध्यक्ष अशोक भाई दाँतेवाड़ीया, ट्रस्टी बाबू लाल मुणोत, माँगी लाल गोवाणी, सुविधी नाथ राजेन्द्र सुरी संघ के अध्यक्ष शान्ति लाल हरण ,एवम महावीर जिनालय के अध्यक्ष कान्ति लाल पोरवाल, व कान्ति लाल भंडारी आदि मौजूद रहे

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